शनिवार, 2 अप्रैल 2022

7 अश्वत्थामा द्वारा द्रोपदी के पुत्रों का मारा जाना और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा का मान मर्दन

 अश्वत्थामा द्वारा द्रोपदी के पुत्रों का मारा जाना और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा का मान मर्दन

6. पूर्व चरित्र का शेष भाग

 नारद जी के पूर्व चरित्र का शेष भाग

5. भगवान के यश कीर्तन की महिमा

 भगवान के यश कीर्तन की महिमा और देवर्षि नारद जी का पूर्व चरित्र।

3 भगवान के अवतारों का वर्णन

 सृष्टिके आदिमें भगवान्‌ने लोकोंके निर्माणकी इच्छा की⁠। इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्त्व आदिसे निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया⁠। उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत—ये सोलह कलाएँ थीं ⁠।⁠।⁠१⁠।⁠। उन्होंने कारण-जलमें शयन करते हुए जब योगनिद्राका विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवरमेंसे एक कमल प्रकट हुआ और उस कमलसे प्रजापतियोंके अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ⁠।⁠।⁠२⁠।⁠। भगवान्‌के उस विराट्‌रूपके अंग-प्रत्यंगमें ही समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है, वह भगवान्‌का विशुद्ध सत्त्वमय श्रेष्ठ रूप है ⁠।⁠।⁠३⁠।⁠।योगीलोग दिव्यदृष्टिसे भगवान्‌के उस रूपका दर्शन करते हैं⁠। भगवान्‌का वह रूप हजारों पैर, जाँघें, भुजाएँ और मुखोंकेकारण अत्यन्त विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हजारों कान, हजारों आँखें और हजारों नासिकाएँ हैं⁠। हजारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणोंसे वह उल्लसित रहता है ⁠।⁠।⁠४⁠।⁠। भगवान्‌का यही पुरुषरूप जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारोंका अक्षय कोष है—इसीसे सारे अवतार प्रकट होते हैं⁠। इस रूपके छोटे-से-छोटे अंशसे देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियोंकी सृष्टि होती है ⁠।⁠।⁠५⁠।⁠। उन्हीं प्रभुने पहले कौमारसर्गमें सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—इन चार ब्राह्मणोंके रूपमें अवतार ग्रहण करके अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया ⁠।⁠।⁠६⁠।⁠। दूसरी बार इस संसारके कल्याणके लिये समस्त यज्ञोंके स्वामी उन भगवान्‌ने ही रसातलमें गयी हुई पृथ्वीको निकाल लानेके विचारसे सूकररूप ग्रहण किया ⁠।⁠।⁠७⁠।⁠। ऋषियोंकी सृष्टिमें उन्होंने देवर्षि नारदके रूपमें तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्रका (जिसे ‘नारद-पांचरात्र’ कहते हैं) उपदेश किया; उसमें कर्मोंके द्वारा किस प्रकार कर्मबन्धनसे मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है ⁠।⁠।⁠८⁠।⁠। धर्मपत्नी मूर्तिके गर्भसे उन्होंने नर-नारायणके रूपमें चौथा अवतार ग्रहण किया⁠। इस अवतारमें उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियोंका सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की ⁠।⁠।⁠९⁠।⁠। पाँचवें अवतारमें वे सिद्धोंके स्वामी कपिलके रूपमें प्रकट हुए और तत्त्वोंका निर्णय करनेवाले सांख्य-शास्त्रका, जो समयके फेरसे लुप्त हो गया था, आसुरि नामक ब्राह्मणको उपदेश किया ⁠।⁠।⁠१०⁠।⁠। अनसूयाके वर माँगनेपर छठे अवतारमें वे अत्रिकी सन्तान—दत्तात्रेय हुए⁠। इस अवतारमें उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदिको ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया ⁠।⁠।⁠११⁠।⁠। सातवीं बार रुचि प्रजापतिकी आकूति नामक पत्नीसे यज्ञके रूपमें उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरकी रक्षा की ⁠।⁠।⁠१२⁠।⁠।राजा नाभिकी पत्नी मेरु देवीके गर्भसे ऋषभदेवके रूपमें भगवान्‌ने आठवाँ अवतार ग्रहण किया⁠। इस रूपमें उन्होंने परमहंसोंका वह मार्ग, जो सभी आश्रमियोंके लिये वन्दनीय है, दिखाया ⁠।⁠।⁠१३।⁠।ऋषियोंकी प्रार्थनासे नवीं बार वे राजा पृथुके रूपमें अवतीर्ण हुए⁠। शौनकादि ऋषियो! इस अवतारमें उन्होंने पृथ्वीसे समस्त ओषधियोंका दोहन किया था, इससे यह अवतार सबके लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ ⁠।⁠।⁠१४⁠।⁠। चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें जब सारी त्रिलोकी समुद्रमें डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्यके रूपमें दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौकापर बैठाकर अगले मन्वन्तरके अधिपति वैवस्वत मनुकी रक्षा की ⁠।⁠।⁠१५⁠।⁠। जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण करके कच्छपरूपसे भगवान्‌ने मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया ⁠।⁠।⁠१६⁠।⁠। बारहवीं बार धन्वन्तरिके रूपमें अमृत लेकर समुद्रसे प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंको मोहित करते हुए देवताओंको अमृत पिलाया ⁠।⁠।⁠१७⁠।⁠। चौदहवें अवतारमें उन्होंने नरसिंहरूप धारण किया और अत्यन्त बलवान् दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी छाती अपने नखोंसे अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनानेवाला सींकको चीर डालता है ⁠।⁠।⁠१८⁠।⁠। पंद्रहवीं बार वामनका रूप धारण करके भगवान् दैत्यराज बलिके यज्ञमें गये⁠। वे चाहते तो थे त्रिलोकीका राज्य, परन्तु माँगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी ⁠।⁠।⁠१९⁠।⁠। सोलहवें परशुराम अवतारमें जब उन्होंने देखा कि राजालोग ब्राह्मणोंके द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे शून्यकर दिया ⁠।⁠।⁠२०⁠।⁠। इसके बाद सत्रहवें अवतारमें सत्यवतीके गर्भसे पराशरजीके द्वारा वे व्यासके रूपमें अवतीर्ण हुए, उस समय लोगोंकी समझ और धारणाशक्ति कम देखकर आपने वेदरूप वृक्षकी कई शाखाएँ बना दीं ⁠।⁠।⁠२१⁠।⁠। अठारहवीं बार देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेकी इच्छासे उन्होंने राजाके रूपमें रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं ⁠।⁠।⁠२२⁠।⁠।उन्नीसवें और बीसवें अवतारोंमें उन्होंने यदुवंशमें बलराम और श्रीकृष्णके नामसे प्रकट होकर पृथ्वीका भार उतारा ⁠।⁠।⁠२३⁠।⁠। उसके बाद कलियुग आ जानेपर मगधदेश (बिहार)-में देवताओंके द्वेषी दैत्योंको मोहित करनेके लिये अजनके पुत्ररूपमें आपका बुद्धावतार होगा ⁠।⁠।⁠२४⁠।⁠। इसके भी बहुत पीछे जब कलियुगका अन्त समीप होगा और राजालोग प्रायः लुटेरे हो जायँगे, तब जगत्‌के रक्षक भगवान् विष्णुयश नामक ब्राह्मणके घर कल्किरूपमें अवतीर्ण होंगे* ⁠।⁠।⁠२५⁠।⁠।

* यहाँ बाईस अवतारोंकी गणना की गयी है, परन्तु भगवान्‌के चौबीस अवतार प्रसिद्ध हैं⁠। 

कुछ विद्वान् चौबीसकी संख्या यों पूर्ण करते हैं—राम-कृष्णके अतिरिक्त बीस अवतार तो उपर्युक्त हैं ही, शेष चार अवतार श्रीकृष्णके ही अंश हैं⁠। स्वयं श्रीकृष्ण तो पूर्ण परमेश्वर हैं; वे अवतार नहीं, अवतारी हैं⁠। अतः श्रीकृष्णको अवतारोंकी गणनामें नहीं गिनते⁠। उनके चार अंश ये हैं—एक तो केशका अवतार, दूसरा सुतपा तथा पृश्निपर कृपा करनेवाला अवतार, तीसरा संकर्षण-बलराम और चौथा परब्रह्म⁠। इस प्रकार इन चार अवतारोंसे विशिष्ट पाँचवें साक्षात् भगवान् वासुदेव हैं⁠।

दूसरे विद्वान् ऐसा मानते हैं कि बाईस अवतार तो उपर्युक्त हैं ही; इनके अतिरिक्त दो और हैं—हंस और हयग्रीव⁠।

4 महर्षि व्यास का असंतोष

2. भगवत कथा और भगवत भक्ति का महात्तम

 वेदव्यास स्तुति,स्कंध1,अध.1: *श्रीमद्भागवत के रूप में आप साक्षात श्री कृष्ण चंद्र जी विराजमान हैं। नाथ !मैंने भवसागर से छुटकारा पाने के लिए आप की शरण ली हैं। मेरा यह मन...

मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है।1।

भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति होते ही, अनन्य प्रेमसे उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव हो जाता है ⁠।⁠।2।⁠। 

धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्‌की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है ⁠।⁠।3।⁠। 

धर्मका फल है मोक्ष⁠। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्तिमें नहीं है⁠। अर्थ केवल धर्मके लिये है⁠। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है ⁠।⁠।4।⁠। 

भोगविलासका फल इन्द्रियोंको तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवननिर्वाह⁠। जीवनका फल भी तत्त्वजिज्ञासा है⁠। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है ⁠।⁠।5।⁠। 

तत्त्ववेत्तालोग ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप ज्ञानको ही तत्त्व कहते हैं⁠। उसीको कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्‌के नामसे पुकारते हैं ⁠।⁠।6।⁠।

प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम⁠। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं⁠। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करानेवाले श्रीहरिसे ही होता है ⁠।⁠।⁠२३⁠।⁠। 

जैसे पृथ्वीके विकार लकड़ीकी अपेक्षा धुआँ श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ है अग्नि —क्योंकि वेदोक्त यज्ञ-यागादिके द्वारा अग्नि सद्‌गति देनेवाला है—वैसे ही तमोगुणसे रजोगुण श्रेष्ठ है और रजोगुणसे भी सत्त्वगुण श्रेष्ठ है; क्योंकि वह भगवान्‌का दर्शन करानेवाला है ⁠।⁠।⁠२४⁠।⁠। 

प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान् विष्णुकी ही आराधना किया करते थे⁠। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं ⁠।⁠।⁠२५⁠।⁠। 

जो लोग इस संसारसागरसे पार जाना चाहते हैं, वे यद्यपि किसीकी निन्दा तो नहीं करते, न किसीमें दोष ही देखते हैं, फिर भी घोररूपवाले—तमोगुणी-रजोगुणी भैरवादि भूतपतियोंकी उपासना न करके सत्त्वगुणी विष्णुभगवान् और उनके अंश—कलास्वरूपोंका ही भजन करते हैं ⁠।⁠।⁠२६⁠।⁠। 

परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्वर्य और संतानकी कामनासे भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभावउन (भूतादि)-से मिलता-जुलता होता है ⁠।⁠।⁠२७⁠।⁠।

 वेदोंका तात्पर्य श्रीकृष्णमें ही है⁠। यज्ञोंके उद्देश्य श्रीकृष्ण ही हैं⁠। योग श्रीकृष्णके लिये ही किये जाते हैं और समस्त कर्मोंकी परिसमाप्ति भी श्रीकृष्णमें ही है ⁠।⁠।⁠२८⁠।⁠। 

ज्ञानसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णकी ही प्राप्ति होती है⁠। तपस्या श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये ही की जाती है⁠। श्रीकृष्णके लिये ही धर्मोंका अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्णमें ही समा जाती हैं ⁠।⁠।⁠२९⁠।⁠। 

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी मायासे, जो प्रपंचकी दृष्टिसे है और तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं है—उन्होंने ही सर्गके आदिमें इस संसारकी रचना की थी ⁠।⁠।⁠३०⁠।⁠।

ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं⁠। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं ⁠।⁠।⁠३१⁠।⁠। 

अग्नि तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है⁠। वैसे ही सबकेआत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक-जैसे जान पड़ते हैं ⁠।⁠।⁠३२⁠।⁠। 

भगवान् ही सूक्ष्म भूत—तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्न-भिन्न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं ⁠।⁠।⁠३३⁠।⁠। 

वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन-पोषण करते हैं ⁠।⁠।⁠३४⁠।⁠।

1. मंगलाचरण,

 श्री सूत जी से शौनकादि ऋषियों का प्रश्न-

मंगलाचरण

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराट्

तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरय: ।

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा

धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥


*जिससे इस जगत की सृष्टि स्थिति और प्रलय होते हैं।वह जड़ नहीं चेतन है, परतंत्र नहीं स्वयं प्रकाश है ,जिस के संबंध में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं, जिसमें यह त्रिगुणमयि जाग्रत स्वप्न ,सुषुप्ति रूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान सत्ता से सत्यवत प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयं प्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और माया कार्य से पूर्णतया मुक्त रहने वाले परम सत्य रूप परमात्मा का ध्यान करते हैं*1/1/1.

प्रश्न:-

सब शास्त्रों में, पुराणों और गुरुजनों के उपदेशों में कल युगी जीवो के परम कल्याण का सहज साधन क्या निश्चित किया गया है ?1/1/9



रविवार, 6 मार्च 2022

अश्वनी


ŚB 10.87.14

श्रीश्रुतय ऊचु:

जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां

त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभग: ।

अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते

क्व‍‍चिदजयात्मना च चरतोऽनुचरेन्निगम: ॥ १४।।

10/87/14/AshwaniN1

हे अजित! आपकी जय, हो जय हो! झूठे गुण धारण करके चराचर जीव को आच्छादित करने वाली इस माया को नष्ट कर दीजिए। आपके बिना बेचारे जीव इसको नहीं मार सकेंगे- न ही पार कर सकेंगे। वेद इस बात का गान करते रहते हैं कि आप सकल सद्गुणों के समुद्र हैं।

10/87/14/वेद 1

The śrutis said: Victory, victory to You, O unconquerable one! By Your very nature You are perfectly full in all opulences; therefore please defeat the eternal power of illusion, who assumes control over the modes of nature to create difficulties for conditioned souls. O You who awaken all the energies of the moving and nonmoving embodied beings, sometimes the Vedas can recognize You as You sport with Your material and spiritual potencies.

प्रथम स्कंध अध्याय 1 से 7 तक। विस्तृत अध्ययन के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: 1to7 अश्वनी

naradvyas.com

shwani N1 

अजित आप ही सर्व श्रेष्ठ हैं, आप पर कोई विजय नहीं प्राप्त कर सकता। आपकी जय हो, जय हो। प्रभु! आप स्वभाव से ही समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं, इसलिए चराचर प्राणियों को फसाने वाली मायाका नाश कर दीजिए। प्रभु!इस गुणमयी मायानेदोष के लिए-जीवो के आनंदआदि में सहज स्वरूप का अच्छादन करके उन्हें बंधन में डालने के लिए ही सत्वआदि गुणों को ग्रहण किया है।जगत में जितनी भी साधना, ध्यान, क्रिया आदि शक्तियां है,उन सब को जगाने वाले आप ही हैं। इसलिए आपके मिटाए बिना यह माया मिट नहीं सकती। (इस विषय में यदि प्रमाण पूछा जाए तो आपकी श्वासभूता श्रुतिया ही-हम ही प्रमाण है।)

यद्यपि हम आप का स्वरूपत:वर्णन करने में असमर्थ हैं, परंतु जब कभी आप माया के द्वारा जगत की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसको निषेध करके स्वरूपस्थितिकी लीला करते हैं अथवा अपना सच्चिदानंदस्वरूप श्रीविग्रह प्रकट करके क्रीडा करते हैं, तभी हम यतकिंचित आपका वर्णन करने में समर्थ होती है।





7 अश्वत्थामा द्वारा द्रोपदी के पुत्रों का मारा जाना और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा का मान मर्दन

 अश्वत्थामा द्वारा द्रोपदी के पुत्रों का मारा जाना और अर्जुन के द्वारा अश्वत्थामा का मान मर्दन